Story behind the story
#आज सुबह से ही चीजें गड़बड़ हो रही थी, मैं एक स्टोरी के लिए निकलना चाह रही थी लेकिन कई तरह की परेशानियों ने घेर लिया। 2 बजे तक जद्दोजहद में गुजरा, कभी कैमरे के लिए तो कभी किसी और चीज के लिए। कभी मेट्रो स्टेशन पर ज्यादातर बैठे रहने से बहस हुई तो कभी कैमरे के लिए लडाई। खैर ये तो रोज का हिस्सा हो गया है। रोज कुछ ना कुछ ऐसे ही किसी न किसी चीज को लेकर जिंदगी से लड़ाई होती है। लेकिन ये भी हिस्सा में है मेरे काम का।
दोपहर के बाद एक दम मन नहीं हुआ मैं काम करूं या किसी स्टोरी के लिए उस एक्साइटमेंट के साथ जाऊं। लेकिन काम करना पड़ता है। मीडिया प्रोफेशन में आपको हर वक्त एक्टिव रहना होता है। अपने आपको रिचार्ज किया। सिर्फ खुद को नहीं बल्कि मेरे ड्राइवर और कैमरा मैन दादा को भी मेरे साथ रहकर नेगेटिविटी न मिले इसलिए खुद को तुरंत सही कर लिया और स्टोरी के दौरान कहीं भी मैंने एक पल के लिए अपने तनाव को चेहरे पर लाने नहीं दिया और जोश और हंसी के साथ आगे करती रही।
शाम तक जब स्टोरी कंप्लीट हो गई तब एहसास हुआ जैसे पता नहीं क्या हुआ था। कैसे इस प्रोफेशन में आपको एक पल तक नहीं मिलता ये सोचने का कि कुछ बुरा लगा है तनाव है, भूख लगी है, गुस्सा है, इरिटेशन है मुझे नहीं पता ये कितना प्रैक्टिकल है और ऐसा करते करते हम नीरस तो नहीं हो जाएंगे। लेकिन इतना जरूर पता है ये प्रोफेशन हमें ये सिखा देता है कि कैसे हम हर परिस्थितियों में भी अपना काम कर सकते हैं, हारते हुए भी फिर से जीतते हैं। मैंने आखिरकार सफलता के साथ अपनी स्टोरी कंप्लीट की। कोई भी फीलिंग बस उस पल के लिए होती है, उसे लॉंग नहीं कैरी करना चाहिए।


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