Story behind the story

कल का दिन भागम भाग में गुजरा, पानी पर एक शो किया। धूप सिर चढ़कर बोल रही थी, पारा 46 था जब कनाट प्लेस पहुंची। लेकिन लगा जैसे गर्मी सबके लिए नहीं है। गर्मी कुछ लोगों के लिेए है। पार्लामेंट हाउस की ओर जाते वक्त देखा एक बाबा रेलिंग साफ कर रहे थे, लगातार उसी लेन पर मैंने कई लोगों को ऐसे ही धूप में काम करते देखा। कुछ लोग उसी वक्त में एसी के अंदर बैठकर काम कर रहे हैं, फिर भी कहते हैं उफ ये गर्मी हाय ये गर्मी। उनका सोचें, जिनकी सुबह यहीं सड़क पर शुरू होती है और यहीं शाम तक धूप ढलने तक पूरा दिन यहीं निकल जाता है।

जो लोग एसी में बैठकर काम करते हैं मैं उन्हें कुछ नहीं कह रही मैं तो बस आधी से ज्यादा आबादी जो कड़ी धूप में सिकती रहती है उनकी बात कर रही हूं, ठेले वाले, ट्रैफिक पुलिस,मजदूर, लेबर क्लास, भीख मांगने वाले, वेंडर, इनके बारे में सोचते हैं तो अपनी गर्मी कम लगती है।

11 बजे से 3 बजे तक मैंने भी धूप में लोगों से बात की, स्टोरी की। स्टोरी खत्म करने के बाद मैं गाड़ी में बैठ जाऊंगी। ऑफिस में बैठकर आउटपुट जानकारी लेता है और एसी में बैठकर स्टोरी बनाता है। गर्मी सबके लिए नहीं है। 

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