#DelhiBlogging- अब करना है तो करना है
लिखने की झिझक कब से आ गई पता ही नहीं चला, पत्रकार, लेखिका, एडिटर होने के बावजूद जब मन की बातों को शब्दों में पिरोने की बारी आती है तो मन घबराने लगता है। उससे भी ज्यादा उसे पोस्ट करके सोशल मीडिया पर शेयर करने से। पता नहीं ऐसा लगता है जैसे कोई क्या सोचेगा, क्या बोलेगा, ये तो मेरी सोच है, मेरी मन की बातें हैं..लोगों को इससे क्या मतलब, वैसे भी इतने लोग इतना कुछ पोस्ट करते हैं। मैं क्या लिखूं और क्यूं पसंद की जाऊं। ये सारी बातें दिमाग में घर करती हैं और फिर मुझे कुछ लिखने और पोस्ट करने से पीछे कर देती हैं। दरअसल, पत्रकारों के साथ एक दिक्कत और होती है कि भाषा सही है या नहीं, अरे मैंने तथ्य सही दिए हैं या नहीं, डब्ल्यू का ध्यान रखा है या नहीं। इन सब चक्करों में कई बार भावनाएं और शब्दों का एहसास गुम हो जाता है। बस खबर जरूर सामने आती है लेकिन उसका मर्म भाषा और व्याकरण में छिप जाता है। इसलिए मैंने सोच लिया है कि अब जो समझ आएगा, दिखेगा, वो भले ही नया हो या पुराना, मैं लिखूंगी और पोस्ट भी करूंगी। मुझे खुद पर बहुत यकीन है कि मेरी नजरें उन चीजों को देख या महसूस कर लेती हैं जो सच में नहीं दिखती।...



