Story behind the story
पत्रकारिता में ऐसा होता है शायद। आप काम करते हैं लेकिन काम और मेहनत से ज्यादा किसी और चीज की इज्जत ज्यादा होती है और अगर आपके पास वो है तो काम आना न आना बड़ी बात नहीं है। मैं रहन सहन की बात कर रही हूं, जरूरी नहीं है कि आप वेनहुशेन के कपडे पहने तो ही आप बड़े पत्रकार दिखेंगे और लगेंगे। आपको मुद्दों की समझ होनी चाहिेए, आपकी खबर और स्टोरी पर पकड़ होनी चाहिए। लेकिन ऐसा कई जगह नहीं होता।
आपके कपड़ों से आपकी पहचान बनती है। एडिटर आपका काम नहीं आपके कपड़े और पूछता है। अगर वो सही है तो आपकी खबर कैमरे पर आएगी। बहुत अजीब लगा था जब पहली बार ऐसा कुछ अपने एडिटर के मुंह से सुना था। हालांकि हम पत्रकार अपने काम से जाने जाते हैं और हां ये भी सच है कि परफेक्ट दिखना भी हमारी कला है। लेकिन कपड़ों को ब्रांड से मापकर आपको छोटा दिखाना और फिर आपकी खबर और काम पर उसका असर। ये बहुत डिमोटिवेट करने वाला सबब है।


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