Story behind the story
आज कहीं शाम को जा रही थी, आते वक्त शेयरिंग ऑटो नोएडा वाले उसमें बैठना पड़ा। रात के 10 बज रहे थे, नोएडा के शेयरिंग ऑटो वो भी ममुरा या गाजियाबाद के । आप समझ सकते हैं क्या आलम होगा। फिर भी मेरा राबता इनसे रोज होता है, कभी कहीं जाना है तो कभी कहीं नोएडा में शेयरिंग की बल्ले बल्ले है। लेकिन इतने गंदे होते हैं ये ऑटो। रोजाना कुछ न कुछ। कोई तरीका नहीं चलाने का। अजीब ड्राइवर, लोग भी अजीब होते हैं। मेरा मतलब आम लोगों से नहीं है लेकिन कुछ वर्ग ऐसे चढ़ते हैं जहां आप सहज नहीं हो सकते ।
आज कुछ ऐसा ही हुआ। एक पूरे गैंग ड्रिंक करके और अजीब से 6 लोग एक साथ ऑटो में और मैं बीच सड़क पर कुछ नहीं मिला तो मैं बैठ गई। बाद में देखा और समझ आया। पूरी ऑटो में अजीब सा आलम। अंधेरा रात बहुत हो गई, वो रोड और रुट भी अजीब है। लेकिन क्या करें। खैर बाद में मैंने रियलाइज किया ये हिम्मत मेरे प्रोफेशन ने मुझे दी है। मैं कई बार ऐसा फेस कर चुकी हूं। मतलब मैं बैठ गई या देखने के बाद बैठी, मैं कभी इन चीजों से नहीं डरती और ना ही सहम जाती हूं ।
बिंदास हिम्मत के साथ रहती हूं। जब किसी से शेयर करती हूं तो सब कहते हैं तुम पागल हो, उतर जाती, ऐसे रिस्क मत लो या फिर ऐसे जाया मत करो। हम ऐसा कभी नहीं करते। लेकिन मुझे हिम्मत मिलती है जैसे भी जहां से भी। इसलिए शायद आज यहां हूं मैं। सात साल पहले दिल्ली जैसे शहर में गांव से एक लड़की पत्रकारिता करने आई थी। इस प्रोफेशन ने इतनी ताकत और हिम्मत दी है। हर काम डटकर अकेले कर सकती हूं। शुक्रिया प्रोफेशन ।


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