अपनों को ही मारता है आतंकवाद
आतंकवाद, “तेज़
नाखून से वार करते हैं, खून से ये बहुत प्यार करते हैं, पास इनके कफ़न लेके जाना,ये तो लाशों
का व्यापार करते हैं, चीख से हर शहर भर गया है कोई
बहरा इसे कर गया है, क़त्ल इतने हुये हैं यहां कि
अब दर्द भी दर्द लगता नहीं हैर......ऐसा ही कुछ आलम इन दिनों
पाकिस्तान के पेशावर का है। वहां की मांओं ने इस सर्दी में दर्द की चादर ओढ़ रखी
है, वे खामोश हैं, पथराई हैं निश्तब्ध हैं।
अपने हाथों से अपने लख्ते जिगर को श्रद्धाजंलि देने
का गम इतना बड़ा हो गया है कि यह तय है कि आने वाले दिनों में उन्हें कोई भी दर्द
दर्द जैसा न लगे। ‘आतंकवाद ’ इस एक जज्बे ने न जाने कितने
मासूमों की जान के साथ खेला है। कभी धर्म के नाम पर, कभी मजहब तो कभी जेहाद के नाम पर कितनी मासूमों की जान ली है, लेकिन इस बार इस दरिदगी के
शिकार फूल से खिलते बच्चें हुए हैं। अब चुप नहीं रहा जाएगा। जी हां बार बार धर्म
को जरिया बनाकर ये घिनौना खेल खेला जाता है, लेकिन इस खेल में हार बस आम
इंसान की ही होती है।
आतंकवाद अलग-अलग रूप में सामने आता है।राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, आतंकवाद तो आतंकवाद होता है। हर बार आतंकवाद की ऐसी कोई घटना होती है, दुनिया कुछ समय के लिए दहल
जाती है, समस्या के समाधान पर चर्चा होती है, प्रशासन और राजनीति में इसकी बहस छिड़ती
है और फिर सब शांत हो जाता है। ये बीमारी वहीं की वहीं रह जाती है। इसका निचोड़
नहीं निकल पाता। आतंकवाद कोई सरहद नहीं देखता, कोई मजहब नहीं देखता, ये तो किसी भी देश और सीमा में पनप सकता है। अब तक कितनी
आतंकी घटनाओं ने अंजाम लिया है, लेकिन हम कभी भी इस बीमारी की जड़ तक नहीं पहुंच पाए हैं, शायद इसलिए अब तक इसका समाधान भी नहीं हो
पाया।
आतंकवाद, तालिबान
या सांप्रदायिकता ये सब एक ही ख़ानदान के बाशिंदे हैं। इनकी भाषा, सोच कहीं ज़हरीली मानसिकता तैयार करती है तो कहीं गोली बंदूक या आत्मघाती
दास्तां। अगर ये कहा जाता है कि धर्म के नाम पर ये सब हो रहा है, तो हमें ज़रूरत है दोबारा धर्म को समझने की, उसे नई
नज़र से सोचने की। धर्म के प्रति सही जागरूकता पैदा करें, क्योंकि
कोई भी धर्म हमें किसी की जान लेना नहीं सिखाता है। धर्म को लेकर भावुक होने की
ज़रूरत नहीं है। धर्म को लेकर सख्त और तार्किक होने की ज़रूरत है। इसे प्रैक्टिकल
नजरिए से देखना होगा।
चंद रोज पहले पाकिस्तान के
पेशावर में एक आर्मी स्कूल में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर में हमें ये सोचने पर
मजबूर कर दिया है सिर्फ हमारा आज नहीं, हमारा भविष्य भी अंधकार में
जल रहा है। वो भी खतरे में है। जी हां जिस तरह से 134 बच्चों की जान ली गई है,
134 मांओं को कभी न मिटने वाला दर्द दिया गया है, उससे ये साबित होता है कि ये हैवानियत इस किदर बढ़ गई है कि इनके नापाक
हाथ अब देश के सुनहरे सपनों को खत्म करने के लिए बढ़ रहे हैं। जिस स्कूल में
बच्चें अपने भविष्य के सुनहरे सपने की गाथा बुनने के लिए जाते हैं, वहां खून की होली खेली गई। भले ही पाकिस्तान में मांओं की गोद सुनी हुई है,
लेकिन मौत का ग़म हिन्दुस्तान में भी है। दर्द तो दर्द होता है। हर
मां का दर्द एक समान ही होता है। वहां सदमा है तो यहां भी लोग गमजादा हैं। यहां भी
मां-बाप के दिल कांप उठे हैं। घटना से कुछ ही दिन पहले तो मलाला ने कांपती आवाज़
में तालिबान को फिर से चुनौती दी थी और बच्चों के अधिकारों की बात की थी और चंद
दिनों में उनके सबसे बड़े अधिकार शिक्षा पर हमला हो गया।
यह
अजीब विडंबना है कि पाकिस्तान की बच्ची मलाला को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के
सप्ताह भर बाद ही उसके देश में स्कूली बच्चों को आतंकियों ने अपना निशाना बनाया। ऐसा नहीं है पाकिस्तान में
पहली बार किसी स्कूल में आतंकी हमला हुआ है, साल 2009-2012 के बीच
पाकिस्तान की स्कूलों में 838 आतंकवादी हमले हो चुके हैं। यूं कोई भी आतंकी घटना
मानवता के नाम पर कलंक ही होती है, लेकिन इस ताजा घटना ने
दरिंदगी का ऐसा उदाहरण पेश किया, जिससे उबरने में न
जाने कितना वक्त लगे। जो बच्चे स्कूल में पढऩे, शरारतें
करने और भावी जीवन की कल्पना करने में मसरूफ रहते थे, अब
उनके सपनों में भी गोलियों की गूंज, खून के छीटें
रहेंगे। अपने साथियों को, शिक्षकों को अपनी आंखों के
सामने मरते देखा है। जो बच्चें जिंदा रह गए हैं वे जीवन भर इस मंजर को भूल नहीं
सकेंगे।
मेरीलैंड यूनिवर्सिटी में एक संस्था है- नेशनल कंसोर्टियम
फॉर द स्टडी ऑफ टेररिज्म ऐंड रिस्पांस। यह संस्था एक ग्लोबल टेररिज्म डाटाबेस
तैयार करती है। इसके डाटा के अनुसार, हाल
के वर्षों में आतंकवादी हमले बहुत ज्यादा बढ़े हैं। वर्ष 2011 में इनकी संख्या 5,000 थी, जो 2012 में 8,000 हो गई और इसके अगले वर्ष बढ़कर 12,000 हो
गई। लेकिन बर्नार्ड कीन ने इसका जो विश्लेषण किया, उसके
हिसाब से ये आंकड़े अपने आप में पूरी कहानी नहीं हैं। पश्चिमी देशों में होने वाले
आतंकवादी हमलों की संख्या पिछले साल काफी बढ़ गई। 2012 में वहां आतंकवाद की 140 वारदात हुई थीं, जो साल 2013 में बढ़कर 250 तक पहुंच गईं। आतंकवादी हमलों में हुई इस बढ़ोतरी की वजह उत्तरी आयरलैंड
और ग्रीस में हुई आतंकवादी वारदात थीं। पश्चिमी देशों में पूरे साल में 12 लोग आतंकवादी वारदात के चलते अपनी जान से हाथ धो बैठे। लेकिन अगर हम पश्चिमी
देशों के बाहर देखें, तो ये आंकड़े कुछ भी नहीं हैं।
गैर-पश्चिमी देशों में 2012 के दौरान आतंकवाद की 8,000 वारदात हुईं, जो अगले साल बढ़कर 12,000 हो गईं। इस बड़ी संख्या का सबसे बड़ा कारण था इराक और पाकिस्तान में हुई
हिंसा के अलावा फिलीपींस व मिस्र की उथल-पुथल। 2013 में इन देशों में 22,000 लोग आतंकवाद का
शिकार बने। और अभी पिछले महीने यानी नवंबर में ही लगभग 5,000 लोग इस्लामिक कट्टरपंथियों की हिंसा का शिकार बने। इनमें से भी ज्यादातर
लोग या तो इस्लामिक स्टेट के हाथों मारे गए या फिर बोको हरम के हाथों।
जब ‘आतंक से जंग’ की बात की जाती है, तो यह सिर्फ एक नारा होता
है, ये असल जंग नहीं है। लेकिन इसका जो शिकार बन रहे
हैं, वे असल लोग हैं। इसमें भी सबसे ज्यादा दुनिया भर
के मुसलमान हैं, जो भारी संख्या में मारे जा रहे हैं।
दुनिया के किसी भी दूसरे मुल्क के मुकाबले पाकिस्तान ने इस जंग में सबसे ज्यादा
लोग खोए हैं। पेशावर में इस सप्ताह हुए हमले के बाद पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी
चुनौती यह है कि वह कौन-सा रास्ता अपनाएगा। आतंकवाद के खिलाफ इस मुल्क का सबसे
बड़ा हथियार गोलियां नहीं हैं, बल्कि शिक्षा है। सबसे
अच्छा तरीका यह है कि इसकी लड़कियां और लड़के स्कूलों में पढ़ने के लिए जाएं।
मलाला ने दो साल पहले जिस तालिबानियों के खिलाफ जिस जंग का आगाज किया था, उसे अब अमली जामा पहनाने का वक्त आ गया है।
जैसा मैं जानती हूं, धर्म
इंसान को कायर या कमजोर नहीं, बल्कि ताकतवर बनाता है। वक्त आ
गया है कि हम सब धर्म के भीतर झांकें। उसे झकझोरें। उसकी ताकत को कुछ कमज़ोर कर
दें। उसकी आवाज़ को कुछ धीमा कर दें। सारे धर्मों में अगर पैग़ाम-ए-मोहब्बत है तो
उस मोहब्बत को ढूंढने निकालें। अगर न मिले तो धर्म को छोड़ दें। आतंकवाद से कोई
नहीं लड़ा है। अभी तक कोई नहीं जीत सका है। इसके कारण अगर धर्म में हैं तो धर्म से
लड़िये। धर्म के नाम पर चुप मत रहिये। जो लोग आतंक फैलाते हैं, वो पहले मारते हैं फिर खुद मर जाते हैं। तो हाथ क्या लगता है। कुछ नहीं,
क्यों आतंक फैलाने वाले इतनी छोटी सी बात नहीं समझते और धर्म की
रक्षा के नाम पर खूनी खेल खेलते रहते हैं। अपनों को ही मारते रहते हैं। आतंकवाद बस अपनों को ही
मारता है।


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