इंडिया के आयरन मैन थे दारा सिंह...

कई दिनों तक अभिनेता महाबली दारा सिंह जिंदगी और मौत से लडऩे के बाद गुरुवार सुबह 7.30 बजे दुनिया से चल बसे। वह काफी दिनों तक मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कई दिनों तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था। डाक्टरों ने बताया की उनके खून में ऑक्सीजन की भारी कमी थी। उनके गांव के गुरुद्वारे में उनकी सलामती की अरदास की जा रही थी। पूरे देश ने उनकी सलामती की दुआएं मांगी। रामायण में हनुमान बनकर भगवान लक्षण के लिए जड़ी बूटी लाने वाले दारा सिंह अपने असल जिंदगी में मौत से नहीं लड़ पाए। ताकत के इस प्रतीक को जो बीमारी हुई थी उसे क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी डेमीलीटेटिंग पॉलीन्यूरोपैथी के नाम से जाना जाता है। कुश्ती की दुनिया में देश विदेश में अपनी कामयाबी का लोहा मनवाने वाले दारा सिंह ने 1962 में हिंदी फिल्मों से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। पहलवानी से पहचान तो मिली ही थी, लेकिन रामायण सीरियल में हनुमान के किरदार ने दारा सिंह को हिंदुस्तान के दिलों में बसा दिया था। 


अखाड़े से फिल्मी दुनिया का सफर

अखाड़े से फिल्मी दुनिया तक का सफर दारा सिंह के लिए काफी चुनौती भरा रहा। दारा सिंह रंधावा का जन्म 19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर के धरमूचक गांव में बलवंत कौर और सूरत सिंह रंधावा के घर हुआ था।

17 वर्ष की आयु में बने बाप

दारा सिंह ने अपनी जीवन के शुरूआती दौर में ही काफी मुश्किलें देखी थी। अपनी किशोर अवस्था में दारा सिंह दूध व मक्खन के साथ 100 बादाम रोज खाकर कई घंटे कसरत व व्यायाम में गुजारा करते थे। बचपन में ही उनके मां-बाप ने उनकी शादी कर दी थी, जिसके बाद 17 साल की नाबालिग उम्र में वह बाप बन गए।

किंगकांग को हराकर बने विश्व चैंपियन

दारा सिंह अपने जमाने के विश्व प्रसिद्ध फ्रीस्टाइल पहलवान थे। उन्होंने 1959 में विश्व चैंपियन जार्ज गारडियांको को कोलकाता में कामनवेल्थ खेल में हराकर विश्व चैंपियनशिप का खिताब हासिल किया। साठ के दशक में पूरे भारत में उनकी फ्री स्टाइल कुश्तियों का बोलबाला रहा। दारा सिंह ने अपने घर से ही कुश्ती की शुरूआत की थी।

भारतीय कुश्ती को दिलाई पहचान

दारा सिंह और उनके छोटे भाई सरदारा सिंह ने मिलकर पहलवानी शुरू कर दी और धीरे-धीरे गांव के दंगलों से लेकर शहरों में कुश्तियां जीतकर अपने गांव का नाम रोशन करना शुरू कर दिया और भारत में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश में जुट गए थे।

सिंगापुर से लौटकर बने चैंपियन

1947 में दारा सिंह सिंगापुर चले गए। वहां रहते हुए उन्होंने भारतीय स्टाइल की कुश्ती में मलेशियाई चंैपियन तरलोक सिंह को पराजित कर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैंपियनशिप जीती थी। उसके बाद उनका विजयी रथ अन्य देशों की ओर चल पड़ा और एक पेशेवर पहलवान के रूप में सभी देशों में अपनी धाक जमाकर वे 1952 में भारत लौट आए। भारत आकर सन 1954 में वे भारतीय कुश्ती चैंपियन बने थे।

अपराजेय रहे दारा

उसके बाद उन्होंने कॉमनवेल्थ देशों का दौरा किया और विश्व चैंपियन किंगकांग को परास्त कर दिया था। दारा सिंह ने उन सभी देशों का एक-एक करके दौरा किया जहां फ्रीस्टाइल कुश्तियां लड़ी जाती थीं। आखिरकार अमेरिका के विश्व चैंपियन लाऊ थेज को 29 मई 1968 को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैंपियन बन गए। 1983 में उन्होंने अपराजेय पहलवान के रूप में कुश्ती से संन्यास ले लिया।

दारा का प्रेम

जब दारा सिंह ने पहलवानी के क्षेत्र में अपार लोकप्रियता प्राप्त कर ली तभी उन्हें अपनी पसंद की लड़की सुरजीत कौर मिल गई। आज दारा सिंह के भरे-पूरे परिवार में तीन बेटियां और दो बेटे हैं। दारा सिंह ने अपने समय की मशहूर अदाकारा मुमताज के साथ हिंदी की स्टंट फिल्मों में प्रवेश किया और कई फिल्मों में अभिनेता बने। यही नहीं कई फिल्मों में वह निर्देशक व निर्माता भी बने।

हनुमान बन बटोरी लोकप्रियता

उन्हें टीवी धारावाहिक रामायण में हनुमानजी के अभिनय से अपार लोकप्रियता मिली जिसके परिणाम स्वरूप भाजपा ने उन्हें राज्यसभा की सदस्यता भी प्रदान की। उन्होंने कई फिल्मों में अलग-अलग किरदार निभाए थे। वर्ष 2007 में आई जब वी मेट उनकी आखिरी फिल्म थी। वर्ष 2002 में शरारत, 2001 में फर्ज, 2000 में दुल्हन हम ले जाएंगे, कल हो ना हो, 1999 में ज़ुल्मी, 1999 में दिल्लगी और इस तरह से अन्य कई फिल्में। लेकिन वर्ष 1976 में आई रामायण में जय बजरंग बली, हनुमानजी का किरदार निभाकर लाखों दिलों को जीत लिया था।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट