#MondayThought: एक तस्वीर अस्पताल की, कुछ लोग वहीं रोज जीते हैं और मरते भी हैं

Life at Hospital - मैं लिखती हूं लगभग रोजाना, लेकिन कई बार ये आंखें बाहरी दुनिया की कुछ ऐसी सच्चाई देख लेती है जो है तो सच लेकिन हम जानकर आंखें बंद करके रखते हैं ताकि वो हमें दिखाई ना दे और कई बार उस सच को लिखना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. जिंदगी के ऐसे ही सच से रू-ब-रू कराते हैं दिल्ली के सरकारी अस्पताल. कोई भी ये नहीं चाहता कि उसे अस्पताल की सीढ़ियां चढ़नी पड़े लेकिन अगर मजबूरी में भी ऐसा होता है तो कभी इसका गम मत कीजिए या फिर अपने भगवान को मत कोसिए. क्योंकि वो आपको जिंदगी के सच से मिलाने और जीवन की कीमत समझाने के लिए शायद इस कठिनाई की ओर रुख करवाता है.


पिछले एक महीने से एम्स (Aiims) और एम्स जैसे कई और अस्पतालों के कैंसर के इलाज के लिए चक्कर लगाते हुए एहसास हुआ कि अब जिंदगी सच में हमारे कंट्रोल से बाहर जा रही है, वो पीड़ा, वो दर्द, इस कदर लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है मानो जैसे वो ही जिंदगी की असलियत है. बाहर तो बस हम एक दोहरी जिंदगी जीते हैं. पहले जो बीमारियां एक उम्र होने के बाद होती थी आजकल वो छोटे छोटे बच्चों को अपनी चपेट में ले रही है. 5 साल के बच्चे को कैंसर, लिवर, हार्ट की बीमारी. कीमो लगने के बाद बच्चे की चेहरे की मुस्कान ही गायब हो जाती है.

Aiims (Cancer Department)
 कोई चल नहीं पाता तो किसी को कंधे और पीठ पर उठाकर अस्पताल लाते हैं. हर कोई अपने अपनों को बचाने के प्रयास में लगा है. सुबह 3 बजे से डॉक्टर को दिखाने की लाइन लगती है और सुबह 10 बजते बजते काउंटर बंद हो जाते हैं. इसके बावजूद लोग अस्पताल के अंदर नहीं जा पाते. काउंटर के बाहर कतारों में लोग खड़े हैं और गार्ड से अपनी बारी की गुहार लगा रहे हैं. कई निराश होकर वहीं सड़क पर सो जाते हैं तो कई घर लौट जाते हैं. ये तस्वीर जितनी दिल दहलाने वाली कहने में लग रही है उससे कहीं ज्यादा असलियत में है. जो लोग अस्पताल के इस दर्द से रोजाना गुजरते हैं, जिनकी दिन और रात यहीं होती है उनकी हिम्मत को सलाम. हम बाहर से उनके दर्द और संघर्ष को ना ही समझ सकते हैं और ना ही बांट सकते हैं. एक तस्वीर अस्पताल की..जो रोज वहीं जीते हैं और मरते भी हैं..

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