...तो ऐसे जिहादी बना कसाब


नई दिल्ली। कहा जाता है कि एक छोटी सी चीज को पाने की जिद इंसान को कहां से कहां ले जाती है। ईद पर अपने पिता द्वारा नए कपड़े नहीं दिए जाने के छोटे से वाक्ये ने कसाब को हिंसक, जिद्दी, जिहादी और अंत में आतंकी एक बना दिया।

पाकिस्तान के पंजाब शहर के ओकारा जिले का रहने वाला कसाब एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखता था। उसके पिता एक वेंडर थे और भाई एक मजदूर था। परिवार की हालत इतनी अच्छी नहीं थी कि हर साल वह ईद पर नए कपड़े पहन सकें। एक बार कसाब के पिता ने उसे ईद पर नए कपड़े देने से इंकार कर दिया। कसाब की अंदरूनी भूख और बढ़ गई। इस भूख को शांत करने के लिए ही वह निकल पड़ा अपने मिशन पर। कसाब ने लश्कर-ए-तैयबा के राजनीतिक संघ जमात-उद-दावा का दामन थाम लिया। वर्ष 2005 में उसने पहली बार जिहाद की घोषणा की। उसके बाद चल पड़ा गुनाहों का सिलसिला। फिर कसाब ने आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए आइएसआइ के तहत ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी।

वर्ष 2008 में हुए मुंबई हमले के आठ महीने पहले कसाब अपने गांव की मिïïट्टी का आर्शीवाद लेने आया था। उसके बाद हुआ मुंबई हमला। इतिहास के पन्नों पर लिखी देश की सबसे बड़ी आतंकी घटना को कसाब ने अपने अन्य साथियों के साथ अंजाम दिया। 
गौरतलब है कि इस घटना को सफल बनाने के लिए कसाब के परिवार वालों को 150,000 रुपए इनाम के तौर पर दिए गए थे। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कसाब की फांसी की सजा पर मुहर लगा दी है। आखिरकार 300 से अधिक लोगों के खून से रंगे आतंकी कसाब को फांसी की सजा मिल ही गई। जिहाद करने वाले मर तो सकते हैं लेकिन कभी आत्म समर्पण नहीं करते। कसाब भी इतने दिनों से इसी सच्चाई को जीता आ रहा था।

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