क्या होगा सीरिया का अंजाम?

सीरिया में विद्रोहियों और सरकारी सेना के बीच लगातार तेज होती जंग ने सीरिया में स्थिरता को लेकर प्रश्नचिन्ह लगा रखा है। इस बीच सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद का साथ छोड़कर जाने वालों की भी कमी नहीं है। हाल ही में सीरिया के प्रधानमंत्री द्वारा विद्रोही गुट से हाथ मिला लेने की खबर से राष्ट्रपति असद को तगड़ा झटका लगा है। वहीं सीरियाई विद्रोहियों के हाथ लगी मिसाइलों ने भी असद की चिंता बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि यह मिसाइल सऊदी अरब और तुर्की की तरफ से आई हैं।

बहरहाल हो कुछ भी लेकिन यह तय है कि सीरिया में चल रहे सत्ता संघर्ष में सीरिया का आर्थिक और सामाजिक हर तरह का नुकसान हो रहा है। इस बीच बशर अल असद बार-बार विश्व समुदाय की उस पेशकश को ठुकराते आ रहे हैं जिसमें उन्हें बाइज्जत राष्ट्रपति पद से हट जाने को कहा था। सीरिया संकट को देखते हुए कुछ देशों ने सीरिया के खत्म हो जाने की भी आशंका जताई है।

मुस्लिम राष्ट्रों की बैठक में भी असद को राष्ट्रपति पद छोडऩे के ऐवज में देश से सुरक्षित बाहर निकालने की बात की गई थी। लेकिन इन सभी बातों का सीरियाई राष्ट्रपति के ऊपर कोई असर होता दिखाई नहीं दे रहा है। दरअसल सीरिया के सबसे बड़े शहर अलेप्पो की लड़ाई यह तय कर देगी कि राष्ट्रपति बशर अल असद रहेंगे या जाएंगे। इसकी वजह है कि अलेप्पो सीरिया का बड़ा शहर होने के साथ साथ एक व्यवसायी केंद्र भी है।

अलेप्पो में कब्जे को लेकर चल रही भीषण लड़ाई में अभी तक हजारों की तादाद में लोग मारे जा चुके हैं। वहीं पूरे विश्व की नजरें भी सीरिया पर लगी हुई हैं। लेकिन यदि यह लड़ाई लंबी चली तो इसमें विद्रोहियों को हार का सामना करना पड़ सकता है। बशर असद के नेतृत्व वाली सरकार के खात्मे की हालत में इस भूभाग में पश्चिम का प्रभाव बढऩे की भी पूरी आशंका है। मुमकिन है कि ऐसी सूरत में यहां पर और अधिक अस्थिरता छा जाए और क्षेत्र में आतंकी वारदातें भी बढ़ जाएं। लिहाजा सीरियाई मुद्दे का शांतिपूर्ण समाधान रूस, ईरान और चीन की बड़ी भूराजनीतिक सफलता सिद्ध होगा।

यदि किसी सूरत से विद्रोही गुट सरकार पर हावी होता है तो मुमकिन है कि विद्रोही राष्ट्रपति बशर अल असद के साथ बेहतर सलूक नहीं करेंगे। यह भी हो सकता है कि गद्दाफी या सद्दाम हुसैन जैसी चीजें दोबारा सीरिया में दिखाई दें। इस बीच माना यह भी जा रहा है कि सीरिया संकट के परिणामों के मद्देनजर राष्ट्रपति असद भूमिगत होकर सेना का संचालन कर रहे हैं। लिहाजा यह बात कहीं न कहीं सच साबित होती दिखाई दे रही है कि असद को सत्ता हाथों से निकलती दिखाई दे रही है।

इस बीच अमेरिका ने सीरिया में विपक्ष को दी जाने वाली सहायता को बढ़ाने की बात भी कही है। हालांकि यह सहयोग सैन्य मदद के लिए है ताकि विपक्ष ज्यादा बेहतर तरीके से एकजुट होकर अपने संगठन को और मजबूत बना सके। हालांकि सीरिया का भविष्य काफी कुछ अलेप्पो की लड़ाई पर ही टिका हुआ है। अगर सरकारी सेना यहां से विद्रोहियों को खदेडऩे में कामयाब रही तभी राष्ट्रपति असद सत्ता में रह सकेंगे अन्यथा नहीं।
दरअसल सीरियाई संकट के दो मोर्चे हैं। एक मोर्चे पर लड़ाई का संचालन अमेरिका, सऊदी अरब, कतर और तुर्की कर रहे हैं। यह पक्ष सीरिया के राष्ट्रपति को संघर्ष के जरिए सत्ता से बेदखल करना चाहता है वहीं दूसरा पक्ष बातचीत कर इस पूरे संकट का हल निकालने का इच्छुक है। इस गुट में रूस, चीन और ईरान शामिल हैं। रूस और चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सीरिया विरोधी प्रस्तावों के मसौदे पर वीटो भी लाए थे।

सीरियाई संकट का समर्थन करने के लिए तुर्की पर जहां सीरियाई विद्रोहियों को हथियार पहुंचाने का आरोप है वहीं कतर, सऊदी अरब इस लड़ाई में विद्रोहियों का वित्तीय सहयोग कर रहे हैं। सीरिया में सरकार और विद्रोहियों के बीच चल रहे घमासान को डेढ़ साल हो चुका है। इस अवधि के दौरान माना जाता है कि विद्रोहियों को उनके समर्थकों से लगभग 36 अरब डालर मिले हैं।

असद को जो सत्ता उनके पिता से 29 वर्ष शासन करने के बाद विरासत में मिली थी वह अब अनिश्चितता के माहौल में दम तोड़ती दिखाई दे रही है। फिलहाल सीरिया जिस खतरनाक दौर से गुजर रहा है उसका जल्दी हल निकलता दिखाई नहीं दे रहा है। वहीं इस संकट का समाधान होने के बाद भी सीरिया को अपने बल पर खड़ा होने के लिए और ध्वस्त हो चुकी अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के लिए काफी लंबा समय लग जाएगा।

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