यत्र नार्युस्त पुज्ययंति तत्र रमति देवता
साल की शुरूआत के कुछ महीनों के बाद ही महानगर कोलकाता सुर्खीयों में आ गया। अपनी बहन रिंकु दास की आबरु बचाने की कोशिश में राजीव दास की मृत्यू , इस घटना ने बंगाल के साथ साथ देश की प्रशासन व्यवस्था पर भी कइ सवाल खड़े कर दिये थे। राज्य में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं यह एक अहम मूद्दा बन गया है।
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्युरो में महिलाओं पर अत्याचार के दो लाख तीन हजार 804 मामले दर्ज हुए हैं। इसमें से बंगाल के 13 हजार 307 मामले हैं। किसी की सुनवाइ हो गयी हैं, कितनों को सजा भी मिली है लेकिन अभी भी देश में 49 हजार बलात्कार के मामले अदालत में लंबित पड़े है।
ग्रह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश भर में पूरे दिन में महिला हिंसा के कम से कम 57 मामले दर्ज होते हैं। यानी अगर देखा जाये तो प्रत्येक दिन हर 25 मिनट पर एक महिला का बलात्कार होता है। कहीं हिंसा तो कहीं बलातकार, कहीं कर्म क्षेत्र में उनसे बदसुलूकी तो कहीं नुक्कर चौबारे में उनसे बदसुलूकी।
हर तीन मिनट में हिंसा का एक नया मामला दर्ज हो जाता है। “ यत्र नार्युस्त पुज्ययंति तत्र रमति देवता” लेकिन अब लगता है कि यह वाक्य सिर्फ ग्रंथों की ही शोभा बढ़ा रहा है। असल जिंदगी में इसका कोइ मतलब नहीं रह गया है, क्योंकि तमाम कानूनों के बावजूद हमारे समाज में महिलाओं के खिलाफ हिंसा बढती ही जा रही है। कहीं ना कहीं वह किसी भी तरीके से हिंसा का शिकार होती है।
भले ही वह एमबीए हो, सीए हो लेकिन वह जहां भी जाये उसे इस बात का एहसास करा दिया जाता है कि वह एक महिला है। जितना महिलाएं देश की प्रगति के पथ पर चल रही है वहीं उनके प्रति अत्याचार व हिंसा के मामले भी बढते जा रहे है। आये दिन बसों में कोइ छेड़के चला जाता है, कभी कोइ रास्ते पर टिटकारियां देता है। यहां तक की अगर वह अपने परिवार के साथ कही जा रही हो तो भी वह सुरक्षित नहीं है। तो क्या हम यह कहे की लड़की होना एक गुनाह बन गया है।
आज जब हम महिला सशक्तिकरण की बात कर रहे है, वहीं यौन हिंसा के अलावा स्त्री विरोधी दूसरे तरह की हिंसाओं के यह आंकडें चौकाने वाले है और स्थिति की गंभीरता को बताते है। बहरलाल ये आंकडें तो समस्या का नमूना भर है। सभी जानते है कि वास्तविक अपराधों की संख्या, दर्ज केसों के मुकाबले कइ गुना अधिक हो सकती है। औरत की इज्जत से जुडे मामले और स्त्री की प्रतिष्ठा को बचाने के नाम पर ऐसा कुछ हो जाए तो उस पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है। उनके खुलासे से भरसक बचा जाता है। यौन हिंसा की ज्यादातर घटनाओं को इसलिए दबाने की हर मुमकिन कोशिश की जाती है।
दूसरी हमारे देश में कानूनी प्रकियाएं इतनी जटिल है कि साधारण लोगों के लिए वहां तक पहुंचना काफी मुश्किल है। इसके बावजूद यदि सिर्फ दर्ज मामलों पर ही गौर किया जाए तो स्थिति की भयावहता का अंदाजा लगाना कितना कठीन होगा।
समाज की हर इकाई के हर संस्थान में,चाहे वह परिवार हो, शिक्षण संस्थान हो या कोइ भी कार्यस्थल, स्त्री कहीं भी भोग लिए जाने वाली बस्तू समझे जाने से बच नहीं पाती। ऐसा सिर्फ अपराधी प्रवृति के लोग ही नहीं सोचते बल्कि दूसरे सभ्य दिखने वाले अन्य तमाम लोगों की सोच भी कुछ इस तरह की होती है।
असल में शहर दिल्ली के नौएडा में होने वाली घटनाएं हमारे समाज की अंदरूनी बीमारी का ही प्रतिबिंबन हैं। हजारों महिलाएं हर साल ऐसिड अटैक का शिकार होती हैं। क्योंकि वह कुछ पुरुषों की इच्छा के सामने आत्मसमर्पण करने से इंकार करती हैं। इसका मतलब किसी भी लड़की को उसके चरित्रसीलता का सर्टिफिकेट क्या एक मर्द से ही लेना होगा ।
अगर उस मर्द ने कह दिया कि वह चरित्रहीन है तो क्या लोगों को उसके साथ कुछ भी करने का हक मिल जाता है। कर्म क्षेत्र में अगर वह पुरुषों से आगे निकल जाता हैं तो उन्हें किसी ना कीसी बहाने से बदनाम करने की कोशिश की जाती है। क्योंकि वह एक महिला हैं और पुरुषों से कैसे आगे जा सकती हैं। ऐसी सोच रखने वाले कइ हैं इस समाज में। जिन्हें सिर्फ यह लगता है कि महिला मशलन घर में काम करने व सजा कर रखने वाली एक शो पीस है। वह कैसे दुनिया की भीड़ में अपनी अलग पहचान बना सकती है। उसकी पहचान तो एक पुरुष के पहचान से ही होगी। जैसे ही वह अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करती हैं उसे रोक दिया जाता है, बदनाम किया जाता हैं।
हम भूल जाते हैं कि वह हमारी छोटी सी दुनिया का हिस्सा हैं। हाल ही में हुइ जनगणना 2011 के आंकडों के मुताबिक देश में छोटी बच्चियों की संख्या कम हो गयी हैं। छह साल की आबादी में एक हजार लडकों के मुकाबले सिर्फ 914 लडकियां ही हैं। यह तस्वीर चिंताजनक होने के साथ ही विद्रुप सामाजिक स्थिति की गवाह है। यह उस बात की ओर हमारा रुख करती है जहां स्त्री को दोयम दर्जे का समझा जाता है। आखीर कार गर्भ में ही बच्चियों को क्यों मार दिया जाता है।
नारी को जन्म लेने के पहले से लेकर मृत्यू पर्य़ंत क्यों कष्ट सहने पर मजबूर किया जाता है। स्त्री अधिकार, स्त्री सशक्तिकरण की बात करने तक अपनी वास्तव जिंदगी में स्त्री के प्रति अनुदार रवैया अपनाना हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो कहीं ऐसा ना हो जाये की विकास की दौड़ अधूरी रह जाये।


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