स्वयं का चिंतन

 बचपन से दूसरों को खुद से आगे रखो, दूसरों को सम्मान दो। खुद के बारे में जो सोचते हैं वह स्वार्थी होते हैं। कुछ ऐसा ही आपने भी सुना है क्या..क्या आप भी ऐसे ही सिद्धांतों के साथ बड़े हुए हैं। अधिकांश भारतीय परिवार में यही शिक्षा मिलती है। माता-पिता, दोस्त, भाई-बहन, चाचा-चाची, हर किसी के सम्मान, उनके प्यार और विश्वास को आगे रखना है, उन्हें क्या पसंद है नहीं है, पहले उसका ख्याल रखना है। उनकी भावनाओं को ठेस न पहुंचे इसका ध्यान पहले रखो, वे क्या सोचते हैं और क्या बोलते हैं, वही सत्य है।  इस बीच स्वयं (मैं) कहीं गुम हो जाती या जाता है। 

बहुत समय बाद जब एहसास होता है कि स्वयं को पीछे छोड़ दिया तब क्या करें, पीछे जा नहीं सकते, आगे बढ़ने में दिक्कत होती है क्योंकि कुछ समझ ही नहीं आता। अपने बारे में कुछ जानने समझने का मौका ही नहीं मिला। सिर्फ औरों के पीछे भागते रहे, अरे दोस्त नाराज न हो जाए, भाई -बहन बुरा न मान जाए। बस खुद को भी कुछ अच्छा लगता है या बुरा लगता है कभी बता ही नहीं पाते। वक्त हाथ से जाता रहता है और जब भीड़ में अकेले खड़े रहते हैं तब लगता है कि अरे जिनके लिए ये सब किया वे कहां हैं आज, कोई नहीं होता साथ...नटसेल यह है कि स्वयं को जितनी जल्दी महत्व देना सीख लेंगे उतना अच्छा है। आप ही आपके काम आएंगे, इसलिए अपनी सेहत और खुशियों को पहले चुनें, कौन कहता है ये स्वार्थ है...कदापि नहीं...जब भीड़ में लड़ना होता है तब कोई नहीं होता साथ।.

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