Inspiring Story: तुम सिंगल मदर हो, पिता भी हो और आज एक लेखिका भी..संघर्षों से भरे तुम्हारे सफर को सलाम

सिंगल मदर का कॉंसेप्ट आजकल बहुत ज्यादा चर्चा में है, एक मां जो मां के साथ साथ अपने बच्चे के लिए पिता की भूमिका भी निभाती है, पिता क्या वो तो अपने बच्चे के जीवन में हर उस रिश्ते की कमी पूरी करती है जिससे वो दूर है. तो सवाल है कि एक सिंगल मदर क्या सिर्फ एक मां ही होती है, नहीं उसे एक जीवन में बहुत सारे रोल निभाने पड़ते हैं, क्योंकि वो एक सिंगल मदर है तो जाहिर है घर की अर्नर भी वही होती है. निजी जिंदगी के साथ साथ अपनी प्रोफेशनल दुनिया को भी किस तरह से बैलेंस करती है, इसका बेहतरीन उदाहरण है हमारे आस पास ही होता है, लेकिन हम उसे नजरअंदाज कर देते हैं या फिर उसकी तारीफ करना हमारे लिए कठिन काम हो जाता है.


मैं ऐसी ही एक आम सी लेकिन खास महिला की बात कर रही हूं, जिससे मैं हाल ही में मिली, वो एक सिंगल मदर है. बहुत कम समय के लिए ही उन्हें जानने का मौका मिला लेकिन सिंगल मदर की भूमिका में वे खड़ी उतरी हैं. हाल ही में उनकी पहली किताब के लिए उन्हें सम्मानित किया गया, ये सम्मान सिर्फ उनका नहीं था बल्कि हर उस सिंगल मदर के नाम है जो अकेले संघर्ष के साथ दो एक जिंदगी को बड़ा करती है और अपने सपने को भी जिंदा रखती है. वो माता पिता के साथ साथ, एक लेखिका, एक पत्रकार, एक कामकाजी महिला, एक स्वतंत्र महिला का किरदार भी बखूबी निभाती है. हर उस मां को ऐसी सिंगल मदर से वो प्रेरणा लेनी चाहिए. 

नाम लिए बगैर कहना चाहूंगी पत्रकारिता की दुनिया में एक वूमेन जर्नलिस्ट पर बहुत तरह के इल्जाम लगाए जाते हैं, खासकर जब वो सिंगल होती हैं, या फिर तलाकशुदा..लेकिन कोई इस बात के पीछे की कहानी पर कभी रोशनी नहीं डालता कि उसके संघर्ष उसके अपने हैं, जब आपने उसके संघर्षों में उसका साथ नहीं दिया तो फिर आज उसकी सफलता पर किस बात का सवाल..शायद मैं भी उन लोगों में ही शामिल थी इसलिए इसे महसूस कर सकती हूं. अकेले अपने बच्चे के साथ जीवन की तमाम लड़ाईयां लड़ने के बाद भी वो हारी नहीं, लोगों ने क्या कुछ नहीं कहा उसे, लेकिन वो अडिग रही और अपने लक्ष्य पर तत्पर..तभी आज वो मंच पर अपनी पहली किताब के लिए सम्मान लेती नजर आई..अगर लोगों की बातों और तानों से वो हार गई होती तो आज वो यहां नहीं होती..किसी की परवाह किए बगैर वो अकेले आगे बढ़ती रही, इस सफर में कई लोगों ने उसका साथ दिया लेकिन उन रिश्तों को कोई नाम नहीं दिया जाता..लेकिन साथ तो साथ होता है..

जीवन ने क्या कुछ नहीं सिखाया होगा उसे, लेकिन वो रुकी नहीं..भले ही कई बार वो गलत होगी, कई बार उसके कदम लड़खड़ाए होंगे, गलतियां की होंगी, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसका पूरा सफर ही नाकाम है..सफर में चलते चलते कदम डगमगाते हैं लेकिन आप चलते रहते हैं, रुकते नहीं..घर पर माता पिता का रोल निभाते हुए भी बाहर की दुनिया की हर वो जिल्लत झेलते हुए भी उसने स्त्री के संघर्ष की गाथा को शब्दों में पिरोया है और एक मुकाम हासिल किया है, हममें से कितने हैं जो ये कर पाते हैं, इसलिए मंजिल पर सवाल उठाने से पहले सफर को ठीक से जान जरूर लें..शुक्रिया 

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