#PostLockdown: इनकी जिंदगी की रौनक तो लौट आई, लेकिन इनका क्या ?
एक तरफ कुछ ऐसे लोग हैं जो कोरोना के बाद से अपनी जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक तबका ऐसा है जो लॉकडाउन खुलते ही, मॉल जाकर अपनी जिंदगी का वही लुत्फ उठा रहा है, जो पहले उठाया करता था। उनकी जिंदगी में वही रौनक फिर से लौट आई है। जारा, एंड, बीबा, फॉरएवर से कपड़े पहनना, ब्रांडेड जूते और एक अच्छे रेस्टोरेंट या कैफे में खाना खाना उनके लिए आज भी एक आम बात है। वे एप्पल के स्टोर में जाकर फोन के एक नए मॉडल की तलाश करते हैं। उनके लिए जिंदगी बिदरंग तो नहीं हुई है।
वहीं दूसरी ओर एक तबका ऐसा है जिनकी जिंदगी पूरी तरह से बदल चुकी है। वे अपने आप को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं, कोई नई नौकरी की तलाश कर रहा है, तो कोई अपने वजूद की, कोई इस बड़े से शहर में फिर से खुद को ढूंढ रहा है तो कोई अपने आप से डरा हुआ है। लोग वापस तो आ गए हैं, लेकिन एक नई शुरुआत करने का साहस नहीं ढूंढ पा रहे हैं। अपनों को खोने के गम से उबरने के बाद अब खुद को दुनिया के सामने फिर से खड़ा करने की कोशिश में जुटे हैं। कितने तो ऐसे हैं जिनका महीने का खर्चा नहीं निकल पा रहा है, मॉल में जाकर कुछ खरीदना तो दूर की बात है। कितने तो ऐसे भी हैं जो दिन भर का खाना तक नहीं जुटा पा रहे हैं। क्योंकि उनकी रोजी-रोटी दिन की दिहाड़ी पर चलती थी,, काम हुआ तो पैसा मिलेगा वरना नहीं। उनके पास कल के भी पैसे जमा नहीं होते हैं। ऐसे लोगों के लिए तो कोरोना के बाद जिंदगी बद –से और बदतर हो गई है। इन्हें तो मॉल के बाहर खड़े रहने का अधिकार तक नहीं है तो अंदर दूर की बात है।वहीं इन सब चीजों से अंजान कुछ बच्चे अपने डैड से कह रहे हैं कि पापा, गाड़ी चेंज कर लीजिए, हम बोर हो गए हैं। अब हमें नई गाड़ी चाहिए। हमें इस तबके से कोई शिकायत नहीं है लेकिन इन्हें इल्म तक नहीं है कि जो पैसा ये एक वक्त में खर्च कर देते हैं वे किसी के महीने भर का राशन हो सकता है। पहले शायद ये बातें लोगों के लिए माइने नहीं रखती थी, लेकिन अब कोरोना ने जिंदगी का मतलब बहुत ही गहराई से समझा दिया है, जिसके पास बहुत कुछ है वो भी असहाय है और जिसके पास कुछ नहीं है वो तो लाचार है ही। इसलिए बहुत ज्यादा की उम्मीद न करते हुए जो है उसमें खुश और संतुष्ट रहें।



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