#MentalHealth कुछ कहना चाहती हूं, लेकिन कैसे कहूं...किससे कहूं ..

"कुछ कहना चाहते होहां बस कुछ...लेकिन कैसे कहूं,..क्या कहूंकहां से शुरू करूं..छोड़ों तुम नहीं समझोगे" समझ के पार एक जहां और भी हैजहां बस सुनना होता हैसमझना नहीं..जहां बस सामने से आ रहे शब्दों को गहराई से सुनना होता है। ताकि सामने वाले को लगे की कोई तो है जो उसकी बातों को नजरअंदाज नहीं कर रहा है, वो भरोसा कर सके...उन बातों के पीछे अपनी समझ या बुझ न लगाए, सही-गलत से न तौलेउचित-अनुचित न देखे, क्यों और कैसे न कहे, कोई जज न करे,कोई कारण न पूछेकोई तोहमत न लगाए और अपनी बात न थोेपे।

क्या इस दुनिया में और आज के इस दौर में ये संभव है
जहां लोग बस आपके कुछ कहने से पहले ही आपको जज करने लगते हैंसही-गलत का टाइटल थमा देते हैं, आपकी बातों और हालातों को अपने चश्मे से देखते हैं। क्या ऐसा कोई हैऐसी कोई जगह है जहां हम बस बगैर कुछ सोचे कुछ भी कह सकेंसोचने से पहले भी सोचना न पड़ेकहने से पहले मन में कसक न होमाथे पर शिकन और दिल में एक डर न हो..

आजकल हर कोई आपको अपने ही नजरिए से देखता हैअगर एक वक्त पहले आप बहुत ही संजीदासुलझे हुएमददगार और एक कामयाब व्यक्ति थे और आज नहीं हैंतो लोग आपको पुरानी वाली पहचान में ही देखना चाहते हैंक्यों वो ये नहीं समझते कि सचिन भी सिक्सर की जगह जीरो पर आउट हो सकता हैएक मजबूत इंसान भी कभी कमजोर पड़ सकता है। उसपर लगाए हुए लेबल को हटाकर उसे नए सिरे से क्यों नहीं देखते हैं।

इसलिए शायद लोगों को अपनी बात कहने में इतना डर लगने लगा है क्योंकि उनके अपने
दोस्तकलिगरिश्देदारहर कोई उन्हें उसी रूप में देखना चाहता है जैसा सालों पहले देखा था...वे नहीं समझ पाते कि आइरन कवच के पीछे एक नरम सामामूली सा इंसान भी रह सकता हैजो कभी भी बिखर सकता है,कमजोर हो सकता है, टूट सकता है। उसे भी सहारे की जरूरत पड़ सकती है। अगर हम उसे उसके नजरिए से देखें तो शायद उसका दर्द समझना आसान हो जाएगा..और एक नए इंसान को हम ढूंढ पाएंगे।

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