#Real Story: मन से विकलांग होना किसी श्राप से कम नहीं....
मैं चलती ट्रेन के अंदर इडली बेचकर नीचे उतर ही रहा था कि अचानक मेरा पैर प्लेटफार्म पर न रुककर, सीधा नीचे घुस गया। पहले तो एकदम से कुछ समझ नहीं आया, जब मेरे पैर और हाथों से खून निकलने लगा और वो हिल नहीं रहे थे, तब समझ आया कि कुछ बड़ा हुआ है। इतने में ही आरपीएफ के जवान आए और मुझे उठाकर अस्पताल ले गए। वो दिन मैं कभी भूल नहीं सकता, मेरी जिंदगी में जैसे हमेशा के लिए ही अंधेरा सा छा गया था। सालों तक मैं यूंही बिस्तर पर बगैर किसी उम्मीद के पड़ा था। अब जाकर फिर से जिंदगी का सामना करने की हिम्मत कर पाया हूं।
ये दर्द भरी दास्तां मेरी जुबानी नहीं है बल्कि सिलीगुड़ी के स्टेशन पर सामान बेचने वाले की है। देबाशिष जिसने अपने दोनों हाथ और एक पैर ट्रेन एक्सीडेंट में खो दिए। मैं देबाशिष से मिली सिलीगुड़ी जाने वाली एक ट्रेन में। बाकी गरीबों की तरह वो भी ट्रेन में भीख मांगता हुआ मुझे नजर आया। एक बार तो उसे आम शख्स समझकर मैंने कुछ पैसे दे दिए, लेकिन तभी मुझे कुछ अलग सा लगा। वो आम नहीं था वो खास था। उसके चेहरे की हंसी और आंखों की चमक उसके हिम्मत और जज्बे की कहानी बयां कर रही थी।
जब कोई विकलांग होता है तो या तो वो खुदको अंदर से भी ऐसा महसूस करता है या फिर उसे ऐसे ही जीने की आदत हो जाती है और कुछ करने की चाहत खत्म। लेकिन देबाशिष ऐसा नहीं था, भीख मांगना उसकी मजबूरी बन गई थी, वो आज भी खुद कुछ काम करके अपने घर का पेट पालना चाहता है। उसके अंदर वो आग वो जुनून दिखाई दे रहा था। उसकी बातों में वो जोश था। वो भीख मांगने से शर्मिंदा नहीं था लेकिन इस जीवन को बेहतर बनाने का एक प्रयास उसके अंदर दिखाई दे रहा था। कोई अगर तन से विकलांग हो जाए तो तकलीफ होती है, लेकिन अगर कोई मन से विकलांग हो जाए तो उसकी जिंदगी ही अंधेरे से घिर जाती है। देवाशिष एक चमकती और बेहतरीन जिंदगी की तलाश में इस जिंदगी को पिछले 6 सालों से ऐसे ही जी रहा है।



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