क्या Corona के बाद नई दिशा ढूंढ लेगा जीवन ?
कोरोना से जंग लड़ते हुए देश को लगभग 6 महीने हो गए हैं, देश का हर नागरिक, भले वो बच्चा हो या बुढ़ा, गरीब हो या अमीर, शहर में रहने वाला हो या गांव में बसने वाला कोई...हर कोई रोजाना एक जंग ही लड़ रहा हो जैसे। कोई अपनी जॉब बचाने की जद्दोजहद में 12-14 घंटे काम कर कर रहा है, तो कोई नई जॉब ढूंढ रहा है, कोई अपने स्वास्थ्य की जंग लड़ रहा है तो कोई जिंदगी की नई दिशा ढूंढ रहा है। मजदूर काम की तलाश में फिर से शहर आ गए हैं और रहने का ठिकाना ढूंढ रहे हैं। इधर, शहरों में किराए पर रहने वाले लोग नौकरी जाने के बाद अपने घरों की ओर लौट रहे हैं। 6 महीनों ने लोगों की जिंदगी उथल पुथल कर दी है।
बच्चे और बुढों का हाल एक जैसा ही है, वे न तो घर से बाहर जा सकते हैं और ना ही घर में उनको लिए कुछ खास करने को है। अगर बाहर जाते भी हैं तो एक डर के साये में जीते हैं। मास्क और सैनिटाइजर में जिंदगी समेटकर रह गई है। गांव की तस्वीर भी कुछ अलग नहीं है। नुक्कड़ के चाय वाले से लेकर छोटी सी पान की दुकान तक हर कोई कोरोना के आंकड़ों पर ही चर्चा करता है..हमें इस डर के साये से निकलना होगा, वरना कोरोना तो चला जाएगा लेकिन हम इसकी दहशत में मर जाएंगे। मैंने कोरोना काल में कुछ महीने गांव में बिताए और कुछ शहर में। दोनों की एक कॉमन तस्वीर मैं आपको बताती हूं।
हर कोई बस एक उलझन में है, आगे क्या होगा, जिंदगी कहां लेकर जाएगी, जिंदगी और रिश्तों की अहमियत लोगों को समझ आई है, हालांकि बाहर निकलने के बाद उस भाग दौड़ भरी जिंदगी में लौटने के बाद सब भूल जाते हैं कि उन्होंने इस दौरान क्या सीखा और आगे की राहें कैसे तय करनी है, लेकिन हां कोरोना ने जिंदगी का एक पाठ हमें सिखाया है जिसे हम बहुत पीछे छोड़ आए थे।



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