Corona ने दिखाई जिंदगी की सच्चाई
आखिरकार कोरोनावायरस ने मेरे किसी अपने की ही जान ले ली। अब तक बस इसे पढ़ा और सुना था, इसकी दहशत को महसूस नहीं किया था। लेकिन आज जब किसी अपने को इसका शिकार होते हुए देखा तो डर लगा। पिछले 4 महीने की अगर बात करें तो पहली बार डर का एहसास हुआ। पिछले दो दिनों से घर में हर कोई डर में जी रहा है। हर वक्त बस कोरोना के साये में जी रहे हैं। ये सही नहीं है मुझे भी मालूम है, लेकिन इतने करीब से कोरोना ने दस्तक दी है कि हर जगह बस कोरोनो ही कोरोना नजर आ रहा है। हम तो भूलने लगे थे कि कोरोना कुछ है भी, क्योंकि हमारे गांव में इसका जलजला नहीं था अब तक, लेकिन अचानक से दो दिन पहले बड़े ताऊजी की मौत से पूरे गांव में सन्नाटा है। हर कोई इसी बात से सहमा है कि अब क्या।
इस दौरान एक बात का एहसास बहुत करीब से हुआ कि वैसे ही इंसान इंसान से कितना दूर हो गया था और अब इस कोरोना ने लोगों को निहाइती दूर कर दिया। ताऊंजी को अंतिम विदाई देने से भी हर किसी को डर लग रहा था। उनके पास खड़े होकर उनकी मौत पर आंसू बहाने से भी हर किसी को डर लग रहा था। किसी और की क्या बात करूं मैं उनके बेटे की अगर बात करूं तो वो तक पास नहीं जाना चाह रहा था। ये जायज भी है और सही है। अगर प्रैक्टिकल सोचें तो सही है लेकिन अगर इमोशनली सोचें तो गलत है । उनको अंत में ढंग से विदाई तक नहीं मिली। उनके अपनों ने उन्हें छूने से इंकार कर दिया। एक बात तो तय है कि जिंदगी यही है और ये एक कड़वा सच। हम सुनते आए थे कि कोई साथ नहीं देता, कोई किसी के साथ मरता नहीं है और ना ही कोई किसी के साथ खत्म हो जाता है। इसलिए प्यार का दूसरा नाम Detachment है। जिंदगी ऐसे ही अपनों के बगैर चलने का नाम ही है। कोरोनावायरस ने जीवन का सच दिखाया है।


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