JLF बन गया सेल्फी फेस्ट..गुम हो गया साहित्य
हर साल की तरह इस साल भी मैं उसी उमंग के साथ जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का हिस्सा बनने पहुंची। पूरे साल मुझे इस फेस्ट का इंतजार रहता है, मुझे लगता है मेरे जैसे हजारों युवाओं को, नए लेखकों को और साहित्य में रुचि रखने वाले लोगों को इस फेस्ट का बेसब्री से इंतजार रहता है, लेकिन इस बार दिल कुछ उदास हो गया वहां जाकर। साहित्य के जिस रस को मैं वहां चखने गई थी, वो कोसों दूर तक नहीं मिला। साहित्य का ये मेला इतना कमर्शियलाइज हो गया कि जिस आधार के साथ लिट फेस्ट की शुरुआत हुई थी, वो आधार ही कहीं खो सा गया है। आयोजकों को पता तक नहीं चला और फेस्ट ने अपनी दिशा ही बदल दी।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का क्रेज केवल जयपुर या राजस्थान में ही नहीं देखने को मिलता बल्कि विदेश तक इसकी खनक गूंजती है। विदेशी लेखक और साहित्यकार इस फेस्ट में शरीक होने के लिए साल भर इंतजार करते हैं। इस लिट फेस्ट में युवा लेखक, साहित्य में रुची रखने वाले लोग, पत्रकार, साहित्यकार, कला व संस्कृति से जुड़े लोगों का समागम होता है। लेकिन साल 2006 में शुरू हुआ ये फेस्ट धीरे-धीरे अपना वो पुराना क्रेज खोता जा रहा है। साहित्य का ये मेला महज सेल्फी और फैशन का मेला बनकर रह गया है। जिस फेस्टिवल में हम लेख और साहित्य जगत की महान हस्तियों के विचारों से रू-ब-रू होने जाते हैं वहां इस बार हमें विचारों के मंथन के अलावा बाकी सब देखने को मिला।
मुझे लिखना बहुत पसंद है, मैं कोई लेखिका नहीं हूं, एक छात्रा हूं लेकिन बड़ी होकर एक लेखिका बनना चाहती हूं। इसलिए मैं यहां आई थी। पिछले कई सालों से सुन रही थी इस फेस्ट के बारे में। इस बार रहा नहीं गया और मैं आ गई। लेकिन क्या हुआ। जो सोचा था वैसा कुछ नहीं मिला। वो वाइव्स कहीं नहीं है। मैंने सोचा था यहां किताबे, नई कविताएं, नए लेख और साहित्य पर बात होगी। हम जैसे नए युवा लेखक लेखिकाओं को कुछ दिशा मिलेगी, हमें दिग्गजों से कुछ राय मिलेगी, लेकिन ऐसा कोई मौका ही नहीं आया। जो लोग पहले से प्रतिष्ठित हैं या तो उनकी किताबों की बातें होती हैं या फिर जिनको लोग जानते हैं उनकी बातें। जो लोग फेस्ट का हिस्सा बनने आएं हैं उन्हें लिटरेचर का एल तक नहीं पता, बस एक घूमने की जगह है जहां अच्छा खाना-पीना मिलता है और मस्ती होती है, तो ये लोग आ गए।
ये कहना है जयपुर निवासी क्लास 10 में पढ़ने वाली योशा खुराना का। दिल्ली से आईं एक महिला उद्यमी पूजा रत्नाकर कहती हैं कि मैंने तो कई सालों से फेस्ट में आना चाहती थी, लेकिन आ नहीं पाई। इस बार मौके मिला और मैं आ गई। लेकिन जैसे सोचा था उम्मीद की थी वैसा कुछ भी नहीं मिला। हां स्पीकर अच्छे हैं लेकिन जिन मुद्दों पर बात होनी चाहिए, या जिस तरह से पूरा फेस्ट चलना चाहिए, वैसा नहीं है। जिस गंभीरता से इस फेस्ट को संचालित होना चाहिए था, वो नहीं हो रहा है। कहीं ना कहीं फेस्ट अपने मकसद से भटकता दिखाई दे रही है।



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