जीवन के आखिरी लम्हों में इस दर्द से जूझ रहे थे अब्दुल कलाम
सोमवार को भारत ने अपना भारत रत्न खो दिया। हम बात कर रहे हैं डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की। सोमवार को उनके निधन से पूरे देश में शोक की लहर फैल गई है। पूरा देश अब उन्हें उनकी कीर्ति और यादों में याद रखेगा। अपने जाते पलों में भी उनके दिल में कुछ दर्द रह गया, जिसे लेकर ही वे दुनिया को अलविदा कह गए।
कलाम जाते-जाते देश के लिए बड़ा एक सवाल छोड़ गए। दरअसल, पिछले कुछ दिनों से वे देश की राजनीति में चल रही उठापटक को लेकर काफी परेशान थे। शिलॉन्ग में आईआईएम में लेक्चर देने से पहले उन्होंने चंद घंटों में बस धरती को जीने लायक बनाने की बात कही।
उनके आखिरी पलों में उनका सहारा बनने वाले सृजनपाल सिंह ने उनके इन चंद घंटों के दर्द को बयां किया। सिंह ने उनके आखिरी दर्द को शब्द में बयां किया।
सिंह ने कलाम के साथ बिताए आखिरी लम्हों का जिक्र किया।
हमने तकरीबन आठ घंटे तक बात की। उन बातों को अब याद करके मुझे कभी रोना आ रहा है तो कभी वो पल मेरे आंखों के सामने उबर कर आ रहे हैं…
27 जुलाई को 12 बजे हमने गुवाहाटी के लिए उड़ान भरी, उन्होंने कलाम सूट पहना हुआ था, मैंने उनकी तारीफ भी की। मुझे उस वक्त ये अंदेशा भी नहीं था कि ये उनके शरीर पर पहना हुआ आखिरी रंग हो जाएगा। हमने ढाई घंटे में ये सफर तय किया। फ्लाइट से उतरने के बाद शिलॉन्ग के आईआईएम तक जाने में और ढाई घंटे लगे। उसी पांच घंटों में हमने खूब बातें की और खूब चर्चा भी।
पहले तो कलाम ने पंजाब में हुए आतंकी हमले पर चिंता जताई, उन्होंने कहा, कितने मासूम लोगों ने आज बेवजह अपनी जान गवां दी। उन्होंने हमले को शिलॉन्ग में होने वाले समारोह से जोड़ दिया। उन्होंने कहा, आजकल इंसानों के हाथ से बने हथियार ज्यादा डर पैदा कर रहे हैं। हमने प्रदूषण, मनुष्य की कार्यविधी और उनके द्वारा बनाए गए खतरनाक आविष्कारों के बारे में बात की। तीस साल, उन्होंने कहा तुम जैसे युवाओं को कुछ करना चाहिए, यही तुम्हारा भविष्य बनने जा रहा है।
इसके बाद हमने राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की, दो दिनों से सदन में हो रहे हंगामे से भी वे खूब चिंतित थे। सदन हमारे लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान है, लेकिन ये ठीक से काम नहीं कर रहा है। मैंने अपने कार्यकाल में दो तरह की सरकारें देखी हैं, लेकिन ये समस्या काफी समय से ही चली आ रही है।
सदन की कार्यवाही अगर रूक जाएगी तो देश का विकास रूक जाएगा। देश आगे नहीं चल पाएगा। ये बिल्कुल ठीक नहीं है। सदन को सुचारू रूप से चलना चाहिए। हमें इसके लिए कोई रास्ता ढूंढ निकालना होगा। उसके बाद उन्होंने मुझे ही इसपर कोई ठोर निकालने की सलाह दी। उन्होंने कहा, शिलॉन्ग में बच्चों से पूछेंगे। वे चाहते थे कि छात्र खुद ही कोई रास्ता बताएं। लेकिन थोड़ी ही देर में उन्हें लगा कि, मेरे खुद के पास जब कोई समाधान नहीं है, तो बच्चों के पास क्या होगा।
इसके बाद हम लेक्चर हॉल में गए। वह लेट नहीं होना चाहते थे। वह हमेशा कहते थे कि छात्रों से इंतजार नहीं करवाया जाना चाहिए। मैंने तुरंत उनका माइक सेट किया, लेक्चर के बारे में थोड़ा ब्रीफ किया और कंप्यूटर संभाल लिया। जैसे ही मैंने उनका माइक सेट किया, वह मुस्कुराए और बोले, ‘Funny Guy! सब ठीक है ना?’जब कभी वह Funny guy कहते, इसके कई मतलब निकलते। इसका मतलब इस बात पर निर्भर करता कि उनकी टोन कैसी थी और आपने क्या अंदाजा लगाया।
इसका मतलब यह हो सकता है कि तुमने बहुत बढ़िया काम किया और यह भी कि तुमने कुछ गड़बड़ कर दी है। पिछले 6 सालों में मुझे ‘Funny guy’ का मतलब समझ आना शुरू हो गया था। इस बार इसे समझने का आखिरी मौका था।’Funny guy! सब ठीक है?’, उन्होंने कहा। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘जी हां।’ ये उनके कहे आखिरी शब्द थे। मैं उनके पीछे बैठा था। उनके दो मिनट के भाषण के बाद मैंने कुछ महसूस किया कि उन्होंने कुछ ज्यादा ही लंबा ठहराव ले लिया है। जैसे ही मैंने उनकी तरफ नजर उठाई, तभी वह गिर गए।
इसका मतलब यह हो सकता है कि तुमने बहुत बढ़िया काम किया और यह भी कि तुमने कुछ गड़बड़ कर दी है। पिछले 6 सालों में मुझे ‘Funny guy’ का मतलब समझ आना शुरू हो गया था। इस बार इसे समझने का आखिरी मौका था।’Funny guy! सब ठीक है?’, उन्होंने कहा। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘जी हां।’ ये उनके कहे आखिरी शब्द थे। मैं उनके पीछे बैठा था। उनके दो मिनट के भाषण के बाद मैंने कुछ महसूस किया कि उन्होंने कुछ ज्यादा ही लंबा ठहराव ले लिया है। जैसे ही मैंने उनकी तरफ नजर उठाई, तभी वह गिर गए।
हमने उन्हें उठाया। डॉक्टर दौड़ता हुआ आया और हमने वह सब कुछ किया, जो कर सकते थे। मैं उनकी बिल्कुल थोड़ी सी खुली आंखों का वह मंजर नहीं भूल सकता। एक हाथ से मैंने उनका सिर पकड़ा था। उनका हाथ मेरी उंगली पर भिंचा हुआ था। उनके चेहरे पर स्थिरता थी और उनकी उन खामोश आंखों से मानो ज्ञान की आभा बिखर रही थी।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनके चेहरे पर दर्द का भी नामो-निशान तक नहीं था। पांच मिनट के अंदर हम नजदीकी अस्पताल में थे। कुछ ही मिनटों में उन्होंने हमें बताया कि मिसाइल मैन ने उड़ान भर ली है, हमेशा के लिए। मैंने आखिरी बार उनके चरण स्पर्श किए।
ऐसा पहली बार नहीं है जब उन्होंने देश की राजनीति या सदन की कार्यवाही पर अपनी राय व्यक्त की थी। वे हमेशा ही देश के हर दिशा और दशा को लेकर चिंतित रहते थे।



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