वॉयस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स’ : आजादी के लिए संघर्ष करता Balochistan

पश्चिमी पाकिस्तान स्थित बलूचिस्तान में आजादी का संघर्ष चरम पर है। पाक सैन्य बलों का बलूच लोगों पर अत्याचार और हिंसा का अंतहीन सिलसिला पिछले एक दशक से तेजी पर है। बलूच के लोगों ने अब सोशल मीडिया पर भी आजादी की मुहिम तेज कर दी है।
यहां बच्चे स्कूल नहीं जाते। लोग आतंकित हैं। किसी ने भाई खोया तो किसी ने बेटा। ऐसे में उनकी हर सुबह दशहत से शुरू होती है। पाक के खिलाफ 5वें बलूच संघर्ष की शुरूआत 2003 में स्वायत्तता की मांग करने वाले कुछ समूहों ने की थी। इनके कई नेता विदेशों में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं और अब पाकिस्तान से आजादी मांग रहे हैं।
हालांकि, पाक सेना, अर्धसैनिक बल और सरकार हमेशा से बलूचिस्तान में हिंसा के लिए जिम्मेदार होने से इनकार करते रहे हैं। इसके लिए वो इस इलाके में सक्रिय हथियारबंद समूहों को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। इस तरह गायब हो रहे लोगों के कुछ मामलों को पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में लिया है।
त्रासदी यह है कि देश में तालिबान से बातचीत को लेकर भारी मतभेद है। इस बातचीत के समर्थन और विरोध में रोज आवाजें उठती हैं लेकिन बलूच राष्ट्रवादियों से वार्ता को लेकर कोई विवाद नहीं है। सभी राजनीतिक दल वार्ता की ज़रूरत को लेकर सहमत नजर आते हैं लेकिन पाक सेना इसके लिए अभी तक राजी नहीं हुई है।
बलूचिस्तान में 27 मार्च को काला दिन या पाकिस्तान के विश्वासघात की वर्षगांठ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बलूचिस्तान के राजकुमार को पाकिस्तान संसद और नेताओं ने वार्ता के लिए आमंत्रित किया उन्हें आश्वासन दिया कि उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा लेकिन पाक ने अपने सारे वायदे तोड़ दिए।
कदीर बलोच उर्फ मामा ने 2013 में बलोच वॉक्स द टॉक की शुरूआत की थी। क्वेटा शहर के चप्पे-चप्पे का जायजा लेने के बाद उन्होंने कराची, इस्लामाबाद में भी अपने आंदोलन को आगे ले जाने का काम किया था।
उन्होंने ‘वॉयस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स’ के माध्यम से जो सिलसिला शुरू किया वो आज आजादी की लड़ाई का रूप ले चुका है। उनका आरोप है कि 20 हजार से ज्यादा बलूच लोगों को गायब कर दिया गया है और कभी पाक सेना उन्हें मार देती है तो कभी घर में घुसकर उनपर गोलियां बरसाती है, कभी उन्हें अगवा कर लेती है।
प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से उम्मीद थी कि वह बलूचियों की भावना को समझेंगे। पर ऐसा कुछ तो नहीं ही हुआ, उल्टे बलूचिस्तान में अशांति के लिए दूसरों पर आरोप लगाया, जबकि इसका कोई सबूत पाकिस्तान नहीं दे पा रहा है। तालिबान और आईएस की मौजूदगी से वहां कानून-व्यवस्था की परेशानी भी है।
आतंकी इलाके में माता का मंदिर भी 
बलूचिस्तान में हिंगलाज माता का मंदिर एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। इस मंदिर की गिनती देवी के प्रमुख 51 शक्ति पीठो में होती है। कहा जाता है कि इस जगह पर आदिशक्ति का सिर गिरा था।
यह मंदिर बलूचिस्तान के ल्यारी जिला के हिंगोल नदी के किनारे स्थित है। कहते हैं कि भारत-पाक बंटवारे से पहले यहां लाखों की तादाद में श्रद्धालु आया करते थे लेकिन अब बिगड़ते हालात के चलते श्रद्धालुओं की संख्या बहुत कम हो चुकी है।
हालांकि, स्थानीय लोगों के लिए इस मंदिर का काफी महत्व है। इस मंदिर के दर्शन करने गुरु गोविंद ङ्क्षसह भी आए थे। यह मंदिर विशाल पहाड़ के नीचे स्थित है। यहां शिवजी का एक प्राचीन त्रिशूल भी है।
बलूचिस्तान एक नजर
बलूचिस्तान पाकिस्तान का पश्चिमी प्रांत है जिसकी राजधानी क्वेटा है। यह ईरान तथा अफगानिस्तान के सटे हुए क्षेत्रों में बंटा हुआ है। यहां के लोगों की प्रमुख भाषा बलूच या बलूची है।
1944 में बलूचिस्तान के स्वतंत्रता का विचार जनरल मनी के विचार में आया था पर 1947 में ब्रिटिश इशारे पर इसे पाकिस्तान में शामिल कर लिया गया। 1970 के दशक में एक बलूच राष्ट्रवाद का उदय हुआ। इसकी कुल आबादी 80 लाख के आसपास है। इसमें 30 जिले और 65 विधानसभा की सीटें हैं जबकि संघीय परिषद 86 हैं।
सोशल मीडिया पर ऑनलाइन अभियान
बलूचिस्तान की आजादी को लेकर बलूज लोगों ने सोशल मीडिया में ऑनलाइन अभियान भी शुरू किया। ट्विटर पर #LibrateBalochistan रविवार से ट्रेंड कर रहा था, जिसमें पाकिस्तान द्वारा बलूच लोगों पर किए जा रहे अन्याय और अत्याचारों की तस्वीरें शेयर की गई।
बलूच लोगों के समर्थन में कई देशों के लोग भी इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए उनकी आवाज़ दुनिया तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या है वॉयस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स
मामा कदीर और फरजाना मजीद के संगठन का नाम है ‘वॉयस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स’। कदीर बलूच रिपब्लिकन पार्टी के प्रवक्ता रहे जलील रेकी के पिता हैं। रेकी को जबरन गायब कर दिया गया था और उनकी हत्या कर उनके शव को फैंक दिया गया था।
फरजाना मजीद बलूच जाकिर मजीद की बहन हैं, जो 8 जून, 2009 को गायब हो गई और उनके बारे में अब भी कोई जानकारी नहीं मिल पाई है।
बलूचिस्तान में जबरिया गायब कर दिए गए लगभग 20,000 लोगों के दुख-दर्द की तरफ ध्यान दिलाने के लिए ये दोनों वीबीएमपी नेता अन्य बलूच कार्यकर्ताओं के साथ क्वेटा से कराची और फिर कराची सैन्य अत्याचारों के खिलाफ 1973-77 के बलूच विद्रोह के गुरिल्ला नेता रहे हैं और बलूचिस्तान के स्वनिर्णय के अधिकार की मांग उठाने के लिए प्रसिद्ध हैं। वह पूर्व रक्षामंत्री मीर अली अहमद तालपुर के बेटे हैं।

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