तो मेट्रो में बना ये रिश्ता...
रोज सुबह मैं और मेरी जैसी तमाम लड़कियां घर से ऑफिस जाने के लिए निकलती हैं। रोजाना वही वक्त होता है, वही मेट्रो और उनके हाथों में वही एक बैग और खाने का थैला। वैसे तो हम कोई भी एक दूसरे को नहीं जानती हैं, लेकिन रोजाना एक ही स्टेशन से मेट्रो लेती हैं और कई तो एक ही डेस्टिनेशन पर उतरती हैं। वैसे तो हर कोई अपने अलग अंदाज में होती है, हर किसी का चाल चलन रहन सहन बिल्कुल अलग होता है। कितने रंग देेखने को मिलते हैं, कोई किसी को जानती नहीं। सब अपने अपने लक्ष्य की तलाश में चलती रहती हैं। सबकी अपनी अपनी समस्याएं हैं। लेकिन फिर भी इतनी विविधताओं के बावजूद उन सबमें एक रिश्ता है। एक एहसास जो उन सबको बांध देता है। हम सब एक जैसी लगती हैं।
मुझे नहीं पता ऐसा कितनों को लगता है, लेकिन मैं रोज इस बात को महसूस करती हूं। कहने को तो हर कोई अलग-अलग घर से आता है, लेकिन आखिर आकर एक ही जगह मिलता है। मेट्रो में सब एक हो जाते हैं। कई की तादाद में लड़िकयां खड़ी रहती हैं, तो कई बैठी रहती हैं। कोई अपने दोस्तों से कॉलेज के किस्से बांटती है, तो कोई ऑफिस कलीग से ऑफिस की गपशप।
कई हाथ में पाउलो कोएल्हो की किताब लिए तो कई आईएस की तैयारी के लिए हाथ में द हिंदू का अखबार लिए खड़ी रहती हैं। किसी ने जिंस पहना है तो किसी ने चुुरिदार, कोई साड़ी में है तो कोई कुर्ते में। सब अपनी अपनी वेश भूषा में रहती हैं। लेकिन एक चीज एक लक्ष्य जो इन सबको एक ही बंधन में बांधता है, वो है अपनी तलाश। खुदकी पहचान बनाने की कवायद। एक छोटी सी कोशिश। इस भीड़ में भी खुद को जान लें, अपने अस्तित्व को तलाश कर लें। सभी बस इसी होड़ में लगी रहती हैं। रोजाना उसी लक्ष्य को ढूंढते ढूंढते उन्हें समझ ही नहीं आया कि कब वे एक रिश्ते में बंध गई।
मुझे लगता है हम सबके बीच एक चीज कॉमन है। वो यही है कि सब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती है। अपने मुकाम पर पहुंचने के लिए हर मुमकिन कोशिश करना चाहती है। किसी भी एंगल से वो मर्दों से कम नहीं है। कैसी भी परिस्थिति में वो खुद को साबित कर सकती है। वो टूटेगी नहीं लेकिन पांच और लोगों को जोड़ने की शक्ति रखती है। ऐसी हैं हम। हम सब एक जैसी हैं। हम मेट्रो



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