...यहां मुकेश जैसे कितने हैं जो रोज करते हैं बलात्कार

suman3एक बार फिर वही दर्द जाग उठा है, वही चीख हर तरफ सुनाई दे रही है। 16 दिसंबर की रात का वो भयावह मंजर आंखों के सामने उतरने लगा है। उस रात भी निर्भया को अंदर से तोड़ दिया गया था और आज फिर उसकी मौत का तमाशा बनाकर उसकी आत्मा को लहु लुहान किया जा रहा है।
इस बार विवाद का मुद्दा निर्भया नहीं, उसकी डॉक्यूमेंट्री है। 16 दिसंबर की रात की पूरी कहानी इस डॉक्यूमेंट्री में है। दरअसल, सवाल इसपर उठ रहा है कि वो दर्दनाक तस्वीर अगर समाज के सामने दोबारा से आते ही तो क्या सोए हुए लोगों की नींद खुलेगी या फिर ये निर्भया का अपमान करने जैसा होगा।
मैं एक आम लड़की हूं, मैंने भी तमाम लोगों की तरह बीबीसी द्वारा बनाई गई ये डॉक्यूमेंट्री देखी। बहुत बारीकी से देखी। कई बार देखी और समझने की कोशिश कि आखिर इसपर इतना हल्ला क्यों हो रहा है। क्यों उस रात के घिनौने सच और उन वैशी दरिंदों की सोच को उजागर किए जाने पर हंगामा मच रहा है। फिल्म या सिनेमा को हम समाज का आईना मानते हैं ऐसे में अगर समाज की छिपी हुई कोई तस्वीर हमारे सामने उजागर होती है तो हमें उसका सामना करने से डरना नहीं चाहिए।
मैं फिल्म के विवाद में नहीं जाना चाहती हूं। इसका प्रसारण कितना सही है और कितना गलत मुझे नहीं पता। ये काम मैं समाज के कुछ बुद्धिजीवियों पर छोड़ देती हूं, वे ही इसका फैसला करेंगे कि ये प्रसारण के योग्य है या नहीं। लेकिन मेरी नजर में वो हर चीज, वो हर सोच, वो हर बात जिसे हम देखना, सुनना या कहना नहीं चाहते वही कहीं न कहीं हमारे समाज को जकड़कर बैठी है। निर्भया के गुनाहगार मुकेश सिंह की बात पर मुझे आश्चर्य होने का मन नहीं हुआ क्योंकि ऐसे कई मुकेश जेल के बाहर बैठे हैं जो अपने शब्दों से रोजाना स्त्री का बलात्कार करते हैं। औरत को खामोश गुड़िया समझकर उसके साथ खेलने का ख्वाहिश तो सभी मर्दों के दिल में होती है लेकिन जैसे ही वो उसकी इच्छा के विरुद्ध जाती है उसका हश्र निर्भया जैसा हो जाता है।
मुकेश की बातें हमारे पुरुष शासित समाज की वो गंदी तस्वीर सामने लाती है जिसमें महिलाओं को बस सेक्स करने का पुतला समझा जाता है। औरत किसी मर्द के साथ सेक्सुअल रिश्ता जोड़ेगी या नहीं ये भी मर्द ही तय करेगी, इसका अधिकार और आजादी बस पुरुष को ही होनी चाहिए ऐसा कौन से ग्रंथ में लिखा है। मुकेश ने अपने इंटरव्यू में कहा कि अगर वो चुप रहती और मुझे अपना काम करने देती तो मैं उसे मारता नहीं। इससे ये साफ झलकता है कि जो भी लड़की अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का विरोध करेगी, अपनी चुप्पी तोड़ेगी उसका हश्र भी कुछ ऐसा ही होगा। तो क्या हमें इस डर से चुप हो जाना चाहिए। हमारी आवाज को दबा लेना चाहिए।
निर्भया ने जिस तरह से इस अपराध किया विरोध किया वह काबिल-ए-तारीफ है, उस वक्त जब ये घटना हुई तब भी लोगों ने निर्भया की जज्बे और साहस को सलाम किया था लेकिन आज मुझे लगता है उसकी हिम्मत के आगे फिर से सिर झुकाना चाहिए। उसका नमन होना चाहिए। जानते हैं क्यों….
क्योंकि मुकेश की बातें समाज की उस गंदी सोच को दर्शाती है जिसमें लड़कियों को ही हर बात के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। उसके रहन-सहन, चाल-चलन, बोल-चाल, पहनावे पर गंदी नजर डाली जाती है और फिर कहा जाता है कि तेरा ही तो दोष था, तभी तेरे साथ ऐसा हुआ। निर्भया ने उन हजारों औरतों को आवाज उठाने की ताकत दी है।
उसने हाथ-पैर मारकर अपना बचाव करने की कोशिश करके उन हजारों औरतों को रास्ता दिखाया है जो कितने समय से इस पुरुष शासित समाज में दबी जा रही है, लेकिन अंजाम के डर से मुंह नहीं खोल पाती है। बस दर्द सहती रहती है और इनकी हवस का शिकार बनती रहती है। निर्भया ने उन हजारों औरतों को लड़ने की एक राह दिखाई है, अगर आपके साथ गलत हो रहा है तो आप चुप न बैठे उसका विरोध करें। वरना वे लोग हमें नौंच खाएंगे। हमें तड़पा-तड़पा कर मार डालेंगे। रोज रौंदेंगे और हम कुछ नहीं कर पाएंगे।
फिल्म का विरोध इसलिए भी हो रहा है क्योंकि इतना घिनौना अपराध करने वाले मुकेश का इंटरव्यू किसी हीरो की तरह लिया गया है, लेकिन क्या आपने ये महसूस किया कि फिल्म में मुकेश नहीं, कितनी निर्भया मुख्य किरदार निभा रही थी। हर वो आम लड़की इस फिल्म की हीरोईन है जो मर्दों से आगे निकलने का जज्बा रखती है, जो अपनी आजादी के लिए लड़ती है, रात दिन काम करती है। कॉल सेंटर जाकर अच्छी अंग्रेजी बोलने की प्रैक्टिस करती है, आसमान में उड़ान भरती है और अपनी नई पहचान बनाती है। क्या आपने उन खामोश लड़कियों को ढूंढने की कोशिश की, जो इस फिल्म की ‘अनसीन हीरोईन’ हैं।

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