स्वस्ति
जियो उस स्नेह में
जो मैंने तुम्हें दिया है
उस दुख में नहीं
जो बेझिझक मैने पिया है
उस गान में जियो
जिसे मैने तुम्हे सुनाया है
उस आह में नहीं
जिसने तुम्हे सताया है
उस द्वार से गुजरों
जो तुम्हारे लिये खोला है
उस अंधकार से नहीं
जिसकी गहराई को
बार-बार मैंने तुमहरी रक्षा की
भावना से टटोला है।
वह भवन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं स्नेह से बुनता हूं,
वे कांटे गोखुरु तो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूं।
वह पथ तुमहारा हो
जिसे तुमहारे हित बनाता हूं
और जो रोड़े हैं उन्हें तराश कर
संवारता सजाता हूं
सागर किनारे तक तुम्हे पहुंचाने का
उद्यम ही मेरा है
फिर वहां जो लहर हो, तारा हो
सोन तरी हो, अरुण सवेरा हो
वह सब, ओ मेरे प्रिय
तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें