"अस्तित्व"

छोड़ दो उसे उड़ने दो, क्या बिगाड़ा है उस मासूम से सपने ने तुम्हारा,

जिसे तोड़ना चाहते हो तुम, जब सांस लेना भी नहीं सीखा था, तब से पनप रही है तुझमें एक सपना बनकर,

एक जान, एक सोच, एक एहसास बनकर,जो धीरे धीरे तुम्हारे साथ ही तुम में ही बढ़ती गई,

 जो तुम्हारे अंदर से निकल कर तुम्हे सवाल करता है कि आखिर क्यों उसने तुम्हारे अंदर रहकर सपनें देखें, अपने अस्तित्व को पाने की कोशिश की...

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